2008 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट: ‘इंडियन मुजाहिदीन’ के आरोपी पीरभॉय को जमानत से इनकार, ट्रायल 8 महीने में पूरा करने का आदेश

0
WhatsApp Image 2026-07-07 at 7.53.44 PM

008 Delhi Serial Blasts: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2008 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट मामले में इंडियन मुजाहिदीन के कथित मीडिया सेल प्रमुख मंसूर असगर पीरभॉय की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि गंभीर आरोपों और प्रथम दृष्टया मजबूत साक्ष्यों के बीच 17 साल की हिरासत जमानत का आधार नहीं बन सकती। साथ ही निचली अदालत को 8 महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया गया।

Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2008 में हुए दिल्ली सीरियल बम धमाकों के मामले में कथित प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘इंडियन मुजाहिदीन’ के मीडिया सेल प्रमुख मंसूर असगर पीरभॉय को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है. अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ आरोपों की गंभीरता और प्रथम दृष्टया (prima facie) मौजूद पुख्ता सबूतों के सामने, उसकी लगभग 17 साल की लंबी न्यायिक हिरासत की दलील कमजोर पड़ जाती है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए निचली अदालत को इस मामले का ट्रायल 8 महीने के भीतर पूरा करने का सख्त आदेश दिया है।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने पीरभॉय की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा अपनी तीसरी जमानत याचिका नामंजूर किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने यह साफ किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निपटारे के लिए हैं और इनका मुख्य आपराधिक मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

’26 लोगों की मौत के मामले में केवल लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं’
अदालत ने सुनवाई के दौरान नोट किया कि आरोपी भले ही एक लंबी अवधि से जेल में बंद है, लेकिन अब यह मुकदमा अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और केवल दो सरकारी गवाहों की गवाही बची है। ऐसे मोड़ पर आरोपी को रिहा करने से चल रही अदालती कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।

जमानत याचिका खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि योजनाबद्ध तरीके से किए गए ऐसे आतंकवादी हमलों के मामले में, ।जिसमें 26 मासूम लोगों की जान गई थी और 135 लोग घायल हुए थे, सिर्फ लंबी हिरासत के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। ये आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं, जिनमें कानूनन मृत्युदंड (फांसी की सजा) तक का प्रावधान है। कोर्ट ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ आम नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार का संतुलन बनाना भी बेहद जरूरी है।

क्या हैं पीरभॉय पर आरोप?
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, मंसूर असगर पीरभॉय प्रतिबंधित संगठन इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया सेल का नेतृत्व कर रहा था। आरोप है कि 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों से ठीक कुछ मिनट पहले, पीरभॉय ने अपने सह-आरोपी मुबीन कादर शेख के साथ मिलकर मुंबई की एक कंपनी के वाई-फाई नेटवर्क को हैक किया था। इसके बाद मीडिया संगठनों को ‘मौत का संदेश’ शीर्षक से एक ईमेल भेजा गया था, जिसमें इन धमाकों की जिम्मेदारी ली गई थी और एक पीडीएफ दस्तावेज के जरिए विस्फोटों की भविष्यवाणी की गई थी।विवेक त्रिपाठी स्टेट हेड चाणक्य न्यूज इंडिया उत्तराखंड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed