कवर स्टोरी | विशेषांक “संघर्ष से सेवा तक” रक्सौल के समाजसेवी रणजीत सिंह: एक ऐसा सफर, जहाँ समाज पहले और स्वयं बाद में रहा विशेष संवाददाता : श्यामल प्रतीक

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समाज में कुछ लोग पहचान बनाते हैं, कुछ लोग इतिहास। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो बिना किसी पद और प्रचार के लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं। रक्सौल के समाजसेवी रणजीत सिंह उन्हीं नामों में से एक हैं।”

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रक्सौल केवल व्यापार और सीमावर्ती गतिविधियों के कारण ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहाँ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने समाज के सबसे कठिन समय में लोगों का हाथ थामा। रणजीत सिंह का सामाजिक जीवन इसी भावना का प्रतीक है। उनकी यात्रा किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा को अपना दर्द मानने से शुरू हुई।

कोरोना काल: जब इंसानियत सबसे बड़ी पहचान बनी

वर्ष 2020 और 2021 पूरी दुनिया के लिए अभूतपूर्व संकट का समय था। कोरोना महामारी ने लाखों परिवारों को प्रभावित किया। अस्पतालों में जगह नहीं थी, लोग दवा और भोजन के लिए संघर्ष कर रहे थे, और भय का वातावरण था।

ऐसे समय में जब अधिकांश लोग अपने घरों में सुरक्षित रहने की कोशिश कर रहे थे, रणजीत सिंह अपनी टीम के साथ सड़कों पर उतरकर जरूरतमंद परिवारों तक राशन, भोजन और आवश्यक सामग्री पहुँचाने में जुटे रहे।

तस्वीरों में दिखाई देने वाले राहत पैकेट केवल खाद्यान्न नहीं थे, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश थे जिन्हें लगा था कि अब कोई उनका साथ नहीं देगा।

उनका मानना था—

“भूख किसी धर्म या जाति की नहीं होती, इसलिए सेवा भी बिना किसी भेदभाव के होनी चाहिए।”

जब अंतिम संस्कार में भी लोग पीछे हट रहे थे

कोरोना महामारी का सबसे दर्दनाक दृश्य वह था, जब कई परिवार अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार तक सम्मानपूर्वक नहीं कर पा रहे थे।

ऐसी परिस्थितियों में रणजीत सिंह और उनके साथियों ने कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अंतिम संस्कार की व्यवस्था में सहयोग किया। यह केवल सामाजिक सेवा नहीं थी, बल्कि मानवता के प्रति एक गहरा दायित्व था।

ऐसे समय में जब लोग संक्रमण के डर से दूर रह रहे थे, तब उन्होंने मानवता का हाथ नहीं छोड़ा।

सात वर्षीय बेटे की वह तस्वीर जिसने पूरे समाज को रुला दिया

कोरोना काल की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक वह थी जब एक सात वर्षीय बालक को अपने पिता का अंतिम संस्कार करना पड़ा। यह दृश्य केवल एक समाचार नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक त्रासदी का प्रतीक बन गया।

ऐसी घटनाओं ने रणजीत सिंह और उनकी टीम को और अधिक सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया। उनका प्रयास केवल सहायता पहुँचाना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी था कि कोई परिवार स्वयं को अकेला महसूस न करे।

गरीब की रोज़ी-रोटी की लड़ाई

समाज सेवा केवल राहत बाँटने तक सीमित नहीं होती।

रक्सौल रेलवे स्टेशन क्षेत्र के फुटपाथ दुकानदारों के सामने जब रोज़गार का संकट खड़ा हुआ, तब रणजीत सिंह उनके साथ खड़े हुए।

उन्होंने प्रशासन से कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन विकास के साथ मानवीय दृष्टिकोण भी होना चाहिए। यदि अतिक्रमण हटाया जाता है तो प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

उनकी अगुवाई में दुकानदारों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी। यह आंदोलन किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाधान की माँग के लिए था।

जब जनहित के लिए आमरण अनशन करना पड़ा

कई बार उन्होंने स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने हेतु आमरण अनशन का रास्ता भी चुना।

उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था का विरोध करना नहीं था, बल्कि जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाना था।

अनशन उनके लिए दबाव की राजनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ उठाने का माध्यम था।

‘स्वच्छ रक्सौल’—एक अभियान, एक संकल्प

रणजीत सिंह के नेतृत्व में ‘स्वच्छ रक्सौल’ केवल एक संस्था नहीं, बल्कि जनभागीदारी का अभियान बन गया।

संस्था ने समय-समय पर—

स्वच्छता अभियान,

पौधारोपण,

पर्यावरण संरक्षण,

रक्तदान,

महिला सशक्तिकरण,

असहाय एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता,

जन-जागरूकता कार्यक्रम

जैसे अनेक कार्यों का संचालन किया।

समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का प्रयास

रणजीत सिंह का मानना है कि समाज की वास्तविक प्रगति तब होती है जब सबसे कमजोर व्यक्ति तक सहायता पहुँचे।

इसी सोच के साथ उन्होंने कई ऐसे परिवारों तक मदद पहुँचाई, जिनकी आवाज़ अक्सर व्यवस्था तक नहीं पहुँच पाती।

संघर्ष नहीं, समाधान की राजनीति

उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने केवल समस्याएँ नहीं उठाईं, बल्कि समाधान भी सुझाए।

चाहे प्रशासन के साथ संवाद हो, सामाजिक संगठनों का सहयोग हो या जनता की भागीदारी—उन्होंने हर स्तर पर सकारात्मक पहल करने का प्रयास किया।

आज भी जारी है सेवा का सफर

समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन रणजीत सिंह की सामाजिक सक्रियता कम नहीं हुई।

आज भी वे पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, मानव सेवा, सामाजिक न्याय और जन-जागरूकता के क्षेत्र में निरंतर कार्य कर रहे हैं।

श्यामल प्रतीक की कलम से

“किसी व्यक्ति की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उन चेहरों से होती है जिनके आँसू उसने पोंछे हों। संकट के समय जो समाज के साथ खड़ा रहता है, वही वास्तव में समाज का सच्चा सेवक कहलाने का अधिकारी होता है।

रणजीत सिंह की यात्रा यह बताती है कि परिवर्तन केवल सरकारों से नहीं आता, बल्कि जागरूक नागरिकों के छोटे-छोटे प्रयास भी समाज की दिशा बदल सकते हैं। यही प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनते हैं।”

(विशेष कवर स्टोरी)

चाणक्य न्यूज़ इंडिया
विशेष संवाददाता : श्यामल प्रतीक

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